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जन्मदिन विशेष | अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

हो रहेगा जो होना है टलेगी घड़ी न घबराए। छूट जाएँगे बंधन से। मौत आती है तो आए।। - अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जन्मदिन विशेष | अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

रहा है दिल मला करें ।
न होगा आँसू आए ।
सब दिनों कौन रहा जीता ।
सभी तो मरते दिखलाए ।।१।।
 
हो रहेगा जो होना है
टलेगी घड़ी न घबराए।
छूट जाएँगे बंधन से।
मौत आती है तो आए।।२।। - अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

 

15 अप्रैल 1865 को पैदा हुए अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ को आज उनके जन्मदिन पर बुकनर्ड्स ढेर सारी शुभकामनाएँ देता है।
 
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’: प्रारंभिक जीवन
अयोध्या सिंह उपाध्याय का जन्म आजमगढ़ (उ.प्र.) के निजामाबाद में हुआ था। मिडिल स्कूल तक कि पढ़ाई आजमगढ़ से ही हुई। इसके बाद की पढ़ाई के लिए ये काशी गए। परन्तु, स्वास्थ्य कारणों से वापस घर आ गए और घर से ही संस्कृत, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी का अध्ययन किया। बाद में 1884 में निर्मला कुमारी के साथ ये परिणय सूत्र के बंधन में बंध गए।


अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’: साहित्यिक जीवन
हरिऔध जी हिंदी भाषा के कवि, निबंधकार और संपादक थे। इनके लेखन शैली की कला बहुत अद्भूत थी। इन्होंने विविध विषयों पर बहुआयामी दृष्टिकोण के साथ लिखा। मसलन वर्ण्य विषय, वियोग और वात्सल्य सम्बन्धी विषय, लोक सेवा की भावना से सम्बंधित विषय, प्रकृति चित्रण इत्यादि। इन्होंने अधिकांश कविताएँ ब्रज भाषा और खड़ी बोली में लिखा। हरिऔध जी की सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध रचना है ‘प्रिय प्रवास’, जो 1914 में लिखी गई। यह खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है। इस महाकाव्य को ‘मंगलाप्रसाद पुरस्कार’ भी प्राप्त हो चुका है।

उनके द्वारा रचित कुछ रचनाओं के नाम निम्नलिखित है-
रुक्मिणी परिणय
चौखे चौपदे
रस कलश
कवि सम्राट
वैदेही वनवास
अधखिला फूल
प्रिय प्रवास
उनके द्वारा लिखित कुछ बाल साहित्य नीचे दिए गए है-
पद्य प्रसून
बाल गीतावली
खेल तमाशा
फूल पत्ते
बाल विभव
हरिऔध द्वारा लिखित कविताओं के कुछ अंश इस प्रकार है-
गौरव गान
वैदिकता-विधि-पूत-वेदिका बन्दनीय-बलि।
वेद-विकच-अरविन्द मंत्र-मकरन्द मत-अलि।
आर्य-भाव कमनीय-रत्न के अनुपम-आकर।
विविध-अंध-विश्वास तिमिर के विदित-विभाकर।
नाना-विरोध-वारिद-पवन कदाचार-कानन-दहन।
हैं निरानन्द तरु-वृन्द के दयानन्द-आनन्द-घन।1।
 जीवन मरण
पोर पोर में है भरी तोर मोर की ही बान
मुँह चोर बने आन बान छोड़ बैठी है।
कैसे भला बार बार मुँह की न खाते रहें
सारी मरदानगी ही मुँह मोड़ बैठी है।
हरिऔधा कोई कस कमर सताता क्यों न
कायरता होड़ कर नाता जोड़ बैठी है।
छूट चलती है आँख दोनों ही गयी है फूट
हिन्दुओं में फूट आज पाँव तोड़ बैठी है।1।
 एक बूँद
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी
हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ : उपलब्धि
हरिऔध जी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में सभापति के रूप में कार्य किया। बाद में, इन्हें सम्मेलन द्वारा “विद्यावाचस्पति” सम्मान से सम्मानित किया गया। 


अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा लिखित किताबों का लिंक नीचे दिया गया है। जिसे आप खरीद सकते हैं-


प्रियप्रवास


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ठेठ हिंदी का ठाठ


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वैदेही वनवास

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अधखिला फूल


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