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जन्मदिवस विशेष | चंद्रधर शर्मा गुलेरी

हिन्दी के अनन्य आराधक और मौलिक प्रतिभा के धनी अमर कहानीकार पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था' कहानी सन् 1915 'सरस्वती' में निकली। यह कहानी न केवल मुक्तकंठ से सराही ही गई प्रत्युत कलात्मकता की दृष्टि से इसे अद्वितीय कहानी घोषित किया गया।

जन्मदिवस  विशेष | चंद्रधर शर्मा गुलेरी

हिंदी, संस्कृत, प्राकृत और पाली भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार चन्द्रधर शर्मा गुलेरी का आज जन्मदिन है। बुकनर्डस और इसके पाठकों की ओर से उन्हें जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं। इनके नाम में गुलेरी शब्द का प्रयोग इनके पिताजी के जन्मस्थान, जो कि हिमाचल प्रदेश है को दर्शाता है। हालांकि चंद्रधर जी का जन्मस्थान राजस्थान का जयपुर जिला है। 

 

 

चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा लिखित किताब “उसने कहा था” बहुत प्रसिद्ध है। इस किताब को लेकर एक विवाद इसे हिंदी साहित्य का प्रथम लघु कथा के रूप में स्वीकार किया जाना है। हालाँकि, 1960 में इस किताब को लेकर एक फ़िल्म बनाई गई, जिसका नाम है-उसने कहा था। 


चंद्रधर शर्मा गुलेरी की एक बहुत दुर्लभ काव्य पाठ आप भी पढ़िए-


झुकी कमान (काव्य)

(1)
आये प्रचंड रिपु, शब्द सुन उन्हीं का,
भेजी सभी जगह एक झुकी कमान।
ज्यों युद्ध चिन्ह समझे सब लोग धाये,
त्यों साथ थी कह रही यह व्योम वाणी।।
“सुना नहीं क्या रणशंखनाद ?
चलो पके खेत किसान! छोड़ो।
पक्षी उन्हें खाय, तुम्हें पड़ा क्या?
भाले भिड़ाओ, अब खड्ग खोलो।
हवा इन्हें साफ़ किया करेगी,-
लो शस्त्र, हो लालन देश छाती।।“
स्वाधीन का सुत किसान सशस्त्र दौड़ा,-
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी।

(2)
छोड़ो शिकारी! गिरी का शिकार,
उठा पुरानी तलवार लीजै।
स्वतंत्र छूटें अब बाघ भालू,
पराक्रमी और शिकार कीजै।
बिना सताये मृग चौकड़ी लें-
लो शस्त्र, हैं शत्रु समीप आए।।
आया सशस्त्र, तज के मृगया अधूरी,
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी।

(3)
“ज्योंनार छोड़ो सुख की, रईसो!
गीतान्त की बाट न वीर! जोहो।
चाहे घाना झाग सूरा दिखावै,
प्रकाश में सुंदरि नाचती हों।
प्रासाद छोड़, सब छोड़ दौड़ो,
स्वदेश के शत्रु अवश्य मारो।।“
सरदार के शत्रु अवश्य मारो,
सरदार ने धनुष ले, तुरही बजाई;-
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी।।

(4)
राजन! पिता की वीरता को,
कुंजों, किलों में सब गा रहे हैं।
गोपाल बैठे जहाँ गीत गावै,
या भाट वीणा झनका रहे हैं।।
अफीम छोड़ो, कुल शत्रु आए-
नया तुम्हारा यश भाट पावैं।’’
बन्दूक ले नृपकुमार बना सु-नेता,
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी II


(5)
“छोड़ो अधूरा अब यज्ञ ब्रह्मण!
वेदान्त-पारायण को बिसारो।
विदेश ही का बलि वैश्वदेव,
औ’ तर्पणों में रिपु-रक्त डारो।।
शस्त्रार्थ शास्त्रार्थ गिनो अभी से-
चलो, दिखाओ हम अग्रजन्मा।।
धोती सम्हाल, कुश छोड़, सबाण दौड़े-
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी।।

(6)
“माता! न रोको निज पुत्र आज,
संग्राम का मोद उसे चखाओ।
तलवार भाले भगिनी! उठा ला,
उत्साह भाई निज को दिलाओ।।
तू सुंदरी! ले प्रिय से विदाई,
स्वदेश मांगे उनकी सहाई।।’’
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी
है सत्य की विजय, निश्चय बात जानी।।
है जन्मभूमि जिनको जननी समान,
स्वातंत्र्य है प्रिय जिन्हें शुभ स्वर्ग से भी,
अन्याय की जकड़ती कटु बेड़ियों को
विद्वान् वे कब समीप निवास देंगे?

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